Thursday, September 16, 2010

लघुकथा
कृपा
चारों ओर चहलपहल थी। जगहजगह तोरणद्वार सजे थे। देशभथ्क्त गीतों के कैसेट बज रहे थे। रहरहकर पांचसात खद्दरधारी इधरसेउधर जाते दिखाई पड़ रहे थे। पूछने पर पता चला कि नेताजी, मंत्री बनने के बाद पहली बार क्षेत्र भ्रमण के लिए आ रहे हैं।
एकाएक कोलाहल मचा। धूल उड़ने लगीं बैंडवाले स्वागतधुन बजाने लगे। तभी कारों का काफिला आकर रूका। बीचवाली कार से एक श्वेत खादीधारी उतरे। पीछे सशस्त्र सुरक्षाकर्मी भी थे। नेताजी आगे बढ़ चले। चारों तरफ उनकी जयजयकार होने लगी। वे रहरहकर हाथ जोड़ लेते थे, परिचितों से कुशलक्षेत्र पूछते और अपरिचितों से बनावटी मुस्कान बिखेर रहे थे।
तभी भीड़ को चीरता एक मोटातगड़ा मुस्टंडा सामने आया। शक्लसूरत नम्बरी गुंडे जैसी थी और साथ में कड़ीकड़ी मूंछों वाले चार युवक भी थे। वह वीरू दादा था। पिछले चुनाव में उसने नेताजी को जिताने में काफी मदद की थी।
उसे देखते ही नेताजी रूके और बोले, ‘‘क्यों रे विरूआ, पहले तो तुम जेब काटते थे, छोटीमोटी चोरी करते थे, लेकिन अब तो तुम्हारे नाम हत्या और लूटपाट की खबरें भी मिलने लगी हैं।’’ उसने दांत निकालकरहेंहें, की और हाथ जोड़कर धीरे से कहा, ‘‘....सब आपकी कृपा है मालिक!’’नेताजी ने उसकी पीठ थपथपायी और हंसते हुए आगे निकल गए।
-सुनील कुमार सुमन

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°